In Focus, हिंदी 31st August, 2016
अलगाव का रास्ता.

अभी कुछ दिन पहले ही अख़बार में एक लेख पढ़ा कि इस वर्ष से हरियाणा के गर्ल्स कॉलेज में 50 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष अध्यापक ही नियुक्त किए जाएंगे  या अधिक से अधिक महिला शिक्षक नियुक्त किए जाएगें। तभी से अंतर्मन में कुछ सवाल रह रह कर उठ रहे थे कि आखिर इस तरह के निर्णय लेने के पीछे कारण क्या है? इस सवाल का जवाब खोजने पर जो मुझे समझ में आता है कि समाज में व्यापत असुरक्षा और विशेषकर महिलओं के प्रति होने वाली हिंसा लगातार बढती जा रही है, जिसके समाधान के रूप समाज उन्हें लिंग के आधार पर एक दुसरे से अलग रखने का प्रयास कर रहा है। हमारी सरकार और समाज का मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहेतर है की हम उन्हें पुरषों के संपर्क से दूर रखे। इसी सोच के तहत् गर्ल्स स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी का निर्माण किया जाता है और इसी तर्ज पर पिंक ऑटो,महिला स्पेशल बस ,ट्रेन चलाई जा रही है।

निश्चित रूप से इन से कुछ लाभ (सुविधाओं के रूप ) तो ज़रूर है,परन्तु ये असल में समस्या का हल नहीं है अपितू ये समस्या को और गहरा कर रहे है । सुरक्षा के नाम पर हम जितना लिंग के आधार पर यह अलगाव और दुरी बढ़ाते है ,उतना ही हम दुसरे लिंग को समझने और उनसे एक सभ्य व्यवहार की सम्भावना को कम कर देते हैं।एक दुसरे को समझने के लिये जब हमे सही अवसर और वातावरण नहीं मिलता तो हम गलत तरीखे से अपने अंदर के आकर्षण और अभिवयक्ति को व्यक्त करते है ।इसके चलते रोज़ाना हम लडकियों से और रही छेड़खानी से लेकर यौन उत्पिरन जसे गंभीर अपराधो को देखते है। अगर बचपन से ही लड़के और लडकियों को एक साथ पढने और आपस में खुल कर अपनी बात कहने और एक दुसरे को समझने का मोका मिले तो ज़रूर इस प्रवृति में कमी आ सकती है। परन्तु समाज की मानसिकता इसके विपरीत है। समाज लड़का और लड़की  को एक दुसरे से दूर रखने में ही समस्या का हल खोजता है,आइये मैं इसकी एक झलक आप को दिखाती हूँ।

हरियाणा का सोनीपत ज़िला शिक्षा के छेत्र में पूरे राज्य में अग्रणी है। सोनीपत शहर में 5 डिग्री कॉलेज हैं जिनमे से 3 गर्ल्स कॉलेज और 2 बॉयज कॉलेज है। इसी ज़िले  के ब्लॉक गोहाना ,खरखोदा ,गन्नौर और मुरथल में भी एक एक डिग्री कॉलेज है और यह सभी गर्ल्स कॉलेज हैं यानि एक भी सहशिक्षा का कॉलेज नहीं। हाँ इसी ज़िले के खानपुर गावं में एक महिला विश्विधालय भी है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारे समाज में सहशिक्षा का कोई महत्व नहीं ? क्या हमारे आस –पास का वातावरण इतना असुरक्षित है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें अपनी भावी पीढ़ी को लिंग के आधार पर एक दुसरे से अलग रखना पड़ रहा है? आखिर क्यों छात्राओं के लिए कवेल महिला शिक्षकों और स्कूल ,कॉलेज की अवश्यकता है? क्या सुरक्षा के नाम पर छात्र और छात्राओं को अलग कर देना सही उपाय है ? लिंग के आधार पर छात्र और छात्राओ को अलग करने से क्या उनके व्यक्तित्व और जीवन पर कुछ प्रभाव पड़ता है? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिये मैंने कुछ युवा कॉलेज के स्टूडेंट्स से सवाल किए, कि क्या वे इस अलगाव/प्रथकता को सही मानते हैं, यदि हाँ तो क्यों और यदि नहीं तो क्यों नहीं? इस अलगाव का उनके जीवन पर क्या प्रभाव हुआ है ?

हिन्दू कॉलेज में विज्ञान स्नातक की छात्रा श्वेता का कहना है “ उनके अभिवावक का मानना है कि लडकियों के सुरक्षा के लिये अलग गर्ल्स कॉलेज होना ज़्यादा  बेहतर हैं क्योंकि समाज का माहोल असुरक्षित है। वही कुछ लोगों का तो ये भी मानना है की साथ उठने बैठने और पढने से चरित्र और समाज की मर्यादा का हनन होता है! ”

विज्ञान स्नातक की ही छात्रा दिव्या का कहना है कि “ग्रामीण आंचल से आने वाली लडकियों के परिवार इसी शर्त पर कॉलेज भेजने  को तेयार होते है कि लडकियों के लिये अलग कॉलेज है।उनके परिवेश में सह शिक्षा को अच्छी नज़र से नहीं देखते हैँ ओर इसका कारण पुरानी सोच और अशिक्षा हैं।”

कला स्नातक के छात्र मनीष का कहना है कि  “पीढ़ी अन्तराल भी एक वजह है, पुरानीं पीढ़ी अभी भी लिगं असमानताओ के चुंगल में फंसी है! जिसका भुगतान भावी पीढ़ी को करना पड़ रहा है।”

कला स्नातक के ही छात्र गोरव का कहना है कि “ सहशिक्षा हम जहाँ एक दुसरे को समझने का मौका देता हैं वही लिंग पर आधारित शिक्षा हमारे मन में एक दुसरे के प्रति संशय उत्पन्न करती है।”

साधना का कहना है कि “आज नयी पीढ़ी लिंग समानता और बराबरी के हक में विश्वास रखती है, परन्तु कुछ लोगों का अब भी यह मानना है कि सहशिक्षा अनुशासनहीनता को जन्म देती है। उनके अनुसार लड़के लडकियों के साथ पढने से उनके बीच एक दुसरे के प्रति आकर्षण पैदा होता होता जिससे कि उनका ध्यान शिक्षा से हट कर फेशन और गलत बातों की तरफ चला जाता है।”

वही जब हमने इस अलगाव के उनके जीवन पर पड़ने पर प्रभाव पर बात की तो कुछ चौकाने  वाली बाते सामने आयी, योगिता का कहना है कि, वह प्रक्टिकल एग्जाम के दौरान  पुरष परीक्षक के सामने असहज महसूस करती हूँ क्योकि शुरू से गर्ल्स स्कूल और कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की हैं!

क्या कोई ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिलाओं को  पुरषों के साथ कंधे से कंधे मिला कर ना चलना पड़े?तो फिर भविष्य के तैयारी के लिये सह शिक्षा के स्थान पर अलगाव क्यों?मनोविज्ञान का भी कहना है कि एक साथ पढने ,खेलने से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण धीरे धीरे सामान्य हो जाता है। यही कारण है कि सह शिक्षा में बच्चे अपने भविष्य के प्रति अपनी उर्जा और ध्यान को केंद्रित कर पाते हैं । एक साथ पढने से उनमे न कवेल आपसी समझ बढती है, साथ ही उनमे लिंग समानता और सामाजिक गुणों की एक समझ उत्पन्न होती है!

इस सब के बावजूद भी अलगाव के लिये दिए जाने वाले तर्क के रूप में असुरक्षित माहौल और यौन  शोषण की घटनाओं को आधार बनाया जाता है जबकि ज़मीनी हकीकत का इससे कुछ लेना देना नहीं; क्योकि अगर हम हरियाणा के एक दुसरे जिले पानीपत की बात करे जहाँ कि सभी कॉलेज में सह शिक्षा है,सोनीपत के मुकबाले ज्यादा सुरक्षित हैं। वहाँ सोनीपत के मुकाबले कम यौन शोषण के केस दर्ज होते है;क्या अब भी आप को लगता है कि अलगाव का रास्ता महिलाओं और लडकियों के लिये एक सुरक्षित समाज के निर्माण में प्रभावी और कारगर साबित होगा ?

(लेखिका हिन्दू गर्ल्स कॉलेज, सोनीपत के रसायन विभाग में सहायक प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं ।)

 

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