शब्दों को बदलने से क्या सोच बदलेगी,सोच बदलें तो शब्द भी बदल जाएंगें.

By: Vineet Tripathi

शब्दों को बदलने से क्या होगा,जब तक महिलाओं को लेकर हमारी सोच नही बदलती है,पहले हमें सोच पर काम करना चाहिए,जब हमारे जह़न में महिलाओं के प्रति इज्जत होगी तो शब्द अपने आप बदल जाएंगे आरजे प्रतीक के इन शब्दों से आप समझ सकते हैं कि ब्रेकथ्रू के ओपेन हाउस में चर्चा का विषय क्या था, फिलहाल हम सब जुटे थे मीडिया और जेंडर के विषय पर चर्चा करने के लिए।

दिल्ली के कांस्ट्टीट्यूशन क्लब में इसी विषय पर चर्चा के लिए जहां पत्रकारिता जगत के देश-प्रदेश के दिग्गज जुटे तो वहीं रेडियों औऱ टीवी के भी नामी चेहरे मौजूद थे।

खबरों औऱ लेखों में किस तरह सें महिलाओं के मुद्दे उठाएं जाएं और शब्दों का चयन क्या होना चाहिए और मीडिया किस तरह से महिला मुद्दों की एडवोकेसी कर सकता है इस उद्देश्य के साथ हुई चर्चा में ब्रेकथ्रू की कंट्री डायरेक्टर व वाइस प्रेसीडेंट सोनाली खान ने कहा कि जनमत निर्माण में मीडिया की काफी अहम भूमिका है,मीडिया अपना यह रोल बखूबी निभा रहा है लेकिन इससे आगे बढ़ कर काम करने की जरूरत है जिससे हम महिला मुद्दों को आगे ले जा सकें और उनसे जुड़े मुद्दों की प्रभावी पैरोकारी कर सकें जिससे उस पर प्रभावी कार्रवाई हो सके।उन्होंने कहा कि मीडिया के सामने भी कई तरह की चुनौतियां हैं और स्वंयसेवी संस्था के रूप में हमारे पास भी,हमें वह स्पेस खोजने की जरूरत हैं जहां हम एक साथ मिल कर काम कर सके।

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला कहते हैं कि हमारे सामने भी खबरों को लेकर हर दिन नई चुनौतियां आती हैं,खबर से पहले उसका प्रोफाइल क्या है,इसमें कंट्रोवर्सी है क्या जैसे सवालों का सामना आम तौर पर हर रोज करना पड़ता है।उन्होंने कहा कि हमें नए शब्दों को खोजने की भी जरूरत है जैसे अकसर हम सुनते हैं कि इज्जत के नाम पर हत्या जिसे हम लोगों ने झूठी शान को लेकर हत्या जैसे शब्दों से बदला है। संवेदनशील मुद्दों के मामले में शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण है।

हिन्दुस्तान के मैनेजिंग एडिटर प्रताप सोमवंशी कहते है कि हम शब्दों के लेकर अकसर चर्चा करते हैं और कई नए शब्दों का प्रयोग हमने खासतौर से महिला मुद्दों को लेकर शुरू किया है।हम महिलाओं के मुद्दों को लेकर काफी संवेदनशील हैं और इस दिशा में बेहतर प्रयास जारी है।
वरिष्ठ पत्रकार व जेंडर मामलों के जानकार नासिर्द्दीन खान कहते हैं कि संवेदशील मुद्दों को मामले में हमें प्रगतिशील भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
आइटलुक की ब्यूरो चीफ भाषा सिंह कहती हैं कि मामला सिर्फ किसी मुद्दे को लेकर संवेदनशील होने का ही नही है बल्कि मीडिया की इन मुद्दों को कवर करने की इच्छा से भी जुड़ा हुआ है,क्या मीडिया भी महिलाओं से जुड़ें मुद्दे को सही तरीके से उठाने के लिए गंभीर है? हमें इस दिशा में भी काम करने की जरूरत है।

पायनियर की फीचर एडीटर रिंकू घोष कहती हैं कि हमें संवेदशील माहौल बनाने की जरूरत है,यह तभी संभव होगा जब प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया बिना लिंग भेद के मुद्दों को उठाए।

गांव कनेक्शन के एसोसिएट एडीटर मनीष बताते हैं कि हमें शहर के साथ गांव का भी रूख करना चाहिए महिलाओं से जुड़ी शहर की खबर तो किसी न किसी तरह से लोगों के बीच आ जाती है लेकिन गांवों की बहुत सी ऐसी खबरें हैं जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती हैं।
नवभारत टाइम्स के रेजीडेंट एडीटर सुधीर कहते हैं कि महिला मुद्दों को लेकर हम लोगों की आवाज बन रहे हैं हाल ही में हमने सेक्सुअल हैरेसमेंट को लेकर लखनऊ में अभियान चलाया था जिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैं जरूरत हैं इस तरह के प्रयास साथ मिलकर किए जाएं जिससें इसका प्रभाव लंबा और परिणाम लाने वाला हो।

ये कुछ विचार थे जो ब्रेकथ्रू के ओपेन हाउस में मौजूद वक्ताओं ने रखें और उन्होंने इस बात पर सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हमें संवेदशील होने के साथ यह भी जरूरी है कि मुद्दों को हम उसके असल रूप में रखे और महिलाओं से जुड़ी सकारात्मक खबरों को भी जगह दें,जेंडर सेंसटिव भाषा का प्रयोग भी मुद्दें के प्रति हमारी सोच को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि हम कि हम महिला मुद्दों के प्रति खबरों और एडवोकेसी को लेकर ब्रेकथ्रू की इस मुहिम के साथ हैं औऱ हम मिलकर इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएंगें जिसमें पहला कदम भाषा को लेकर एक शब्दकोष बनाने पर काम करेंगें।
उम्मीद हैं छोटे-छोटें कदमों के साथ शुरू हुई यह मुहिम एक दिन रंग लाएगी और महिला मुद्दों को लेकर मीडिया की नज़र और नजरिया दोनों ही बदलेगा।

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