हरियाणा के पंचायती राज में महिला पंचों​ व सरपंचों की स्थिति.

हरियाणा राज्य आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध राज्य है। यहाँ पर बहुत सारे उधोग हैं, लेकिन फिर भी हरियाणा को ग्रामीण राज्य के नाम से जाना जाता है। यहाँ  शहरों की तुलना में गाँव ज्यादा है तथा गाँव में लोग ज्यादातर कृषि पर निर्भर है या फिर दिहाड़ी मजदूरी पर। हरियाणा के गाँवों में शिक्षा की कमी है, खासकर महिलाओं की शिक्षा पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। आर्थिकता के साथ साथ यदि राजनैतिक दृष्टिकोण की बात की जाए तो हरियाणा के गाँवों की पंचायतों में महिला सरपंचों या पंचों की भूमिका ना के बराबर है।

वैसे तो केन्द्र सरकार ने पंचायती चुनावों में  महिलाओं को 33% आरक्षण दे रखा है। महिलाओं को गाँवों में पंच सरपंच का चुनाव लड़ने का अधिकार है, किंतु सच्चाई कुछ और ही है। 3 साल तक स्कूल में तारों की टोली के साथ लिंग भेद पर काम करने के बाद ब्रेकथ्रू संस्था ने जब हमें गाँव में समुदाय में काम करने को कहा, तो हम वहां गाँव में पंच सरपंचों से मिलने गए। वहां गाँवों में महिला पंचों तथा सरपंचों के बारे में जानकारी मिली तो मैं उनसे मिलने उनके घर गया। तब मुझे पता चला की वहां स्थिति कुछ और ही थी।

ऐसा ही एक व्याख्या मेरे साथ एक गाँव में हुआ तो वहाँ जाकर मालूम हुआ कि इस गाँव की सरपंच एक महिला है। जब उनसे  मिलने मैं उनके घर पर गया तो पता चला कि महिला सरपंच 45 डिग्री के तापमान पर लकड़ियां लेने जंगल में गई थी, तथा उनके पति उनके स्थान पर लोगो से बातचीत कर रहे थे। वहां पहुँचकर जब मैंने  महिला सरपंच से मिलने का समय मांगा तो उनके पति महोदय ने कहा कि, “आपको जो बातें करनी हैं मेरे से कर लो क्योंकि गाँव के पंचायत से संबंधित कार्य में ही करता हूं। वह तो केवल मेहमानों के लिए चाय बनाती हैं, तथा चूल्हा चौंका संभालती है।”

ऐसा ही एक दूसरे गाँव में जाकर महिला सरपंच से बात करने का मौका मिला तो महिला सरपंच ध़ूधंट में नजर आई और कहा कि आपको जो भी बात है हमारे मर्दों (ज्यैषठ,पति या ससुर) से कर लो क्योंकि पंचायतों को वो ही संभालते है। इससे साफ पता चला कि गाँवों में महिला सरपंचों या पंचो की भूमिका ना के बराबर है। लेकिन शायद इसका कारण भी पुरूष प्रधान समाज का होना है। पुरुष प्रधानता के चलते अगर किसी गाँव में महिला सरपंच है भी, तो भी उसकी नहीं चलती।

महिला पंचों या महिला सरपंच को निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं है। सब जगह महिला पंच-सरपंचों के पति की चलती है। स्थिति इतनी दयनीय है कि PRI मीटिंग में महिला सरपंच तथा महिला पंचों को घूंघट में बैठना पड़ता है, तथा निर्णय उनके पति लेते हैं। महिला को तो सिर्फ कागज़ों पर हस्ताक्षर करने होते हैं । सरपंच जैसे पद पर आसीन होने के बावजूद भी महिला की पहचान उसके पति से होती है ना कि खुद से।

गाँवों में कोई भी विकास कार्य हो या विकास कार्य की नींव रखनी हो तो वह कार्य महिला सरपंच का पति करता है। गाँव के विकास कार्य के लिए सरकार से जो अनुदान या जो पैसा आता है वह महिला सरपंच के पति या रिश्तेदार द्वारा खर्च होता है। महिला सरपंच या महिला पंचों को घर की चार दीवारी में कैद कर लिया जाता है। अक्सर जब गाँव में जाते हैं और महिला सरपंच से मिलना होता है तो उनकी दुर्दशा देखकर रोना आता है; महिला सरपंच घर के कामकाज करती हुई मिलती है, तथा उनके पति या रिश्तेदार मूंछों का ताव देकर बिल्कुल साफ सुन्दर कपड़े पहनकर बैठे रहते हैं तथा अपने आपको प्रधान कहलवाना पसंद करते हैं। महिला पंचों या सरपंचों को जो मेहनताना मिलता है वो भी उनके पति के पास चला जाता है या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो अगर महिला सरपंच को घर में रहना है तो उसको मेहनताना अपने पति को देना ही पड़ता है।

महिलाओं की इच्छा का गला घोंट दिया जाता है। महिला पंच या सरपंच अगर गलत के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाना भी चाहती है तो उसे घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। गाँव में महिलाओं को पंच सरपंच के पद पर चुनाव लड़ने के लिए जो निर्णय लिया जाता है वो भी पुरूषों की सलाह मशवरा से होता है। यदि महिला सरपंच या पंच जागरूक हो तो वो अपना, अपने आसपास तथा गाँव के विकास में अपनी सहभागिता निभा सकती है, गाँव के विकास के विषय में सोच सकती है। महिला पंच या सरपंच को उनकी शक्ति के विषय में अवगत कराना चाहिए। गाँव में महिला सरपंच या पंचों को ग्रामीण इलाकों में होने वाली समस्याओं की भली भांति जानकारी होती है। यदि उन्हें पंच या सरपंच होने का पूरा अधिकार प्राप्त हो तो गाँव के विकास के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है।

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